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साला
अभी अभी हुआ यक़ीन की आग है मुझ में कही
हुई सुबह मैं जल गया
सूरज को मैं निगल गया
रू-ब-रू रोशनी... रू-ब-रू रोशनी हे
जो गुमशुदा-सा ख्वाब था
वो मिल गया वो खिल गया
वह लोहा था पिघल गया
खींचा खींचा मचल गया
सितार में बदल गया
रू-ब-रू रोशनी ... .. रू-ब-रू रोशनी है
धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा .. .
धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा
आँधियों से जघड़ रही है लौ मेरी
अब मशालों सी भाड़ रही है लौ मेरी
नामो निशान रहे ना रहे
ये कारवाँ रहे ना रहे
उजाले में पी गया
रोशन हुआ जी गया
क्यों सहते रहे
रू-ब-रू रोशनी .. रू-ब-रू रोशनी है
धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा
रू-बा-रू रोशनी .. रू-बा-रू रोशनी है
साला... साला... साला...



Авторы: A RAHMAN, PRASOON JOSHI, A.R. RAHMAN



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